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भारत के 46वें मुख्य न्यायाधीश बने रंजन गोगोई, सामने हैं ये बड़ी चुनौतियां

नईदिल्ली । देश को  46 वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायाधीश रंजन गोगोई ने शपथ ले ली है। उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गोपनीयता की शपथ दिलाई।  न्यायधीश गोगोई इस पद पर पहुंचने वाले पूर्वोत्तर भारत के पहले मुख्य न्यायधीश हैं। उनका कार्यकाल  17 नंवबर, 2019 तक रहेगा। देश का मुख्य न्यायाधीश होना अपने आपमें ही एक चुनौती का विषय रहा है। न्यायाधीश रंजन गोगोई को भी पदभार संभालते ही इन चुनौतियों का करना पड़ेगा सामना।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को पद संभालते ही मिलेगीं ये चुनौतियां

-मुख्य न्यायाधीश के सामने कामकाज की लंबी फेहरिस्त होगी लेकिन इनसबके बीच पिछले कई वर्षों से विवादों में रहा अयोध्या मंदिर विवाद सबसे ऊपर है। इसे निपटाना उनकी अभी की सबसे बड़ी चुनौती होगी। पिछले आठ वर्षों से भी अधिक समय से चला आ रहा देश का यह सबसे अहम मुद्दा है जिसपर देश- दुनिया की निगाहें टिकीं हैं।

-अयोध्या मामले में  28 अक्टूबर को शीर्ष अदालत की तीन जजों की बेंच सुनवाई शुरू करने जा रही है। सीजेआई गोगोई को तीन बेंच के लिए जजों की घोषणा करनी है। यह मामला पिछले आठ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

-इसी के साथ उन्हें सबसे बड़ी चुनौती के रूप में न्यायिक कामकाज की भारी भरकम सूची को निपटाने की होगी। समय- समय पर आ रहे आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा समय में  करीब 3.30 करोड़ मामले कोर्ट में लंबित पड़े हैं।

-वैसे तो यह लंबे समय से आ रही चुनौती है जिसे हर वर्ष और हर नए सीजेआई के लिए यह बड़ी चुनौती रहती है। करीब एक दशक से न्यायपालिका में जजों के पद खाली हैं जिसकी वजह से मामले लंबित पड़े हैं अब देखना होगा कि गोगोई कितनी जल्दी इसपर कार्रवाई करते हैं।

-कॉलेजियम में सुधार और पारदर्शिता के लिए मेमोरेन्डम ऑफ प्रोसिजर (एमओपी) में बदलाव पर पिछले तीन वर्षों से सरकार और सुप्रीम कोर्ट में विवाद रहा है। एमओपी में विरोध के कारण ही  देश भर के उच्च न्यायालयों में जजों के 40 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में 20 फीसदी पदों पर नियुक्ति नहीं हो पा रही है। अब देखना यह होगा कि मुख्य न्यायाधीश गोगोई इस बारे में सरकार के साथ सहमति का पुल कैसे बना पाते हैं।

-मुख्य न्यायाधीश के सामने एक और बड़ी चुनौती होगी केंद्रीय बजट की। 2017-18 में न्यायायिक व्यवस्था के लिए सिर्फ 0.4 फीसदी का बजट मिला था। जबकि न्यायायिक संस्थाओं में बुनियादी ढांचों की भारी कमी है।

-न्यायाधीश गोगोई के पिता मुख्यमंत्री थे। इसके बावजूद वह नेताओं और राजनेताओं के खिलाफ सख्त हैं और सख्ती से कानून का पालन करते हैं और कराते हैं। बता दें कि पहले जिन मुकदमों की सुनवाई उन्होंने की थी उसमें नेताओं पर चल रहे आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालत बनाने का भी निर्देश दिया था।

-गोगोई इस बेंच का हिस्सा थे जिसने 2013 में आपराधिक पृष्ठभूमि का पूरा ब्यौरा दिये बगैर नेता चुनाव नहीं लड़ सकते वाला फैसला सुनाया था। सरकारी खर्च पर विज्ञापनों में नेताओं की तस्वीर छापने से रोकने के लिए आदेश देने के अलावा उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्रियों को दिए गए सरकारी बंगलों के आवंटन को रद्द करने का फैसला भी इन्होंने ही दिया था। अब उनकी बड़ी चुनौती होगी आने वाले चुनावों में नेताओं की अनैतिकता और गैर कानूनी कामों पर अंकुश लगाना।

-जस्टिस गोगोई के फैसले के बाद ही असम में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनआरसी) का नियम लागू हुआ। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में लंबी प्रक्रिया के बाद बनी लिस्ट के अनुसार असम में 40 लाख लोग अपनी नागरिकता के दावों को साबित नहीं कर पाए। जस्टिस गोगोई की बेंच ने दावों और आपत्तियों की सुनवाई के लिए और अधिक समय देते हुए दस्तावेजों के बारे में नये दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

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