Breaking News

मुंशी प्रेमचंद अपनी कहानियाँ सुनाने ही धरती पर आये थे

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी के लमही ग्राम में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपतराय था। उनके पिता अजायबराय डाकखाने में एक क्लर्क थे। बचपन में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था तथा उसके बाद सौतेली मां के नियंत्रण में रहने के कारण उनका बचपन बहुत ही कष्ट में बीता। धनपत को बचपन से ही कहानी सुनने का बड़ा शौक था। इसी शौक ने इन्हें महान कहानीकार व उपन्यासकार बना दिया। प्रेमचंद की शिक्षा का प्रारंभ उर्दू से हुआ। लगभग चौदह वर्षों तक केवल उर्दू में लिखने के बाद उन्होंने जब हिन्दी की ओर अपना पहला कदम रखा, तभी हिन्दी साहित्य जगत में अनुभव किया गया कि हिन्दी कथा-उपन्यास साहित्य के क्षेत्र में एक युगांतरकारी परिवर्तन आ गया है। इस साहित्यिक क्रांति का यह आश्चर्यजनक पहलू था कि यह ऐसे लेखक की कलम से उपजी थी, जो उर्दू से हिन्दी में आया था।

संसार में विरले ही ऐसे हुए जिन्होंने सृजन को इतनी उत्कट बेचैनी लेकर जीवन जिया। उनके शब्दों में जादू था और जीवन इतना विराट कि देश-काल की सीमाएं समेट नहीं पाईं उनके वैराट्य को। उन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य के क्षेत्र में कथ्य और शिल्प दोनों में आमूलचूल बदलाव किया। लेखन की एक सर्वथा मौलिक किन्तु सशक्त धारा जिनसे जन्मी, वे हैं मुंशी प्रेमचन्द। इतिहास और साहित्य में ऐसी प्रतिभाएं कभी-कभी ही जन्म लेती हैं। वाल्मीकि, वेदव्यास, कालिदास, तुलसीदास, कबीर और इसी परम्परा में आते हैं प्रेमचन्द। 31 जुलाई 2019 को उनका 140वां जन्मदिन है, जिनसे भारतीय साहित्य का एक नया और अविस्मरणीय दौर शुरू हुआ था। जिनके सृजन एवं साहित्य की गूंज भविष्य में लम्बे समय तक देश और दुनिया में सुनाई देती रहेगी। आज जब हम बहुत ठहर कर बहुत संजीदगी के साथ उनका लेखन देखते हैं तो अनायास ही हमें महसूस होता है कि वे अपने आप में कितना विराट संसार समेटे हुए हैं। ऐसा भी प्रतीत होता है कि शायद वे कहानियां सुनाने ही धरती पर आए थे। इसीलिये तो उन्हें कथा-सम्राट भी कहा जाता है।

मुंशी प्रेमचंद बहुत ही आदर्शवादी व ईमानदार व्यक्ति थे। कुछ दिन शिक्षा विभाग में नौकरी की लेकिन बाद में गांधीजी के आह्वान पर नौकरी छोड़ दी और साहित्य सृजन में लग गये। एक प्रकार से प्रेमचंद आर्यसमाजी व विधवा विवाह के प्रबल समर्थक भी थे। 1910 में मुंशी प्रेमचंद की रचना सोजे वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। सोजे वतन की सभी प्रतियां जब्त कर ली गयीं। जिलाधीश ने उन्हें अब और आगे न लिखने के लिए कहा और कहा कि यदि दोबारा लिखा तो जेल भेज दिया जायेगा। इस समय तक धनपत राय मुंशी प्रेमचंद के नाम से लिखने लग गये थे। उनकी पहली कहानी सरस्वती पत्रिका में 1915 के दिसम्बर अंक में ‘सौत’ प्रकाशित हुई और अंतिम कहानी ‘कफन’ नाम से। मुंशी प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की। भारतीय साहित्य का बहुत-सा विमर्श जो बाद में प्रमुखता से उभरा चाहे वह दलित साहित्य हो या फिर नारी साहित्य उसकी जड़ें प्रेमचंद के साहित्य में दिखाई पड़ती हैं। उनके प्रमुख उपन्यासों में सेवासदन, गोदान, गबन, कायाकल्प, रंगभूमि प्रेमाश्रय, कर्मभूमि आदि हैं। उनकी ‘बांका जमींदार’, ‘विध्वंस’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘घासवाली’, ‘ठाकुर का कुआं’, ‘गुल्ली डंडा’, ‘दूध का दाम’, ‘सद्गति’ आदि कहानियों में दलित जीवन की पीड़ा एवं वेदना के चित्र हैं। उनके साहित्य में स्त्री-विमर्श का व्यापक संसार भी है। उनकी लगभग 50 कहानियों में किसानी जिन्दगी एवं संस्कृति का मर्मस्पर्शी चित्रण भी देखने को मिलता है। जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र या समस्या नहीं है जिस पर उन्होंने कलम न चलाई हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Time limit is exhausted. Please reload the CAPTCHA.

Optimization WordPress Plugins & Solutions by W3 EDGE

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com